SHAKTI  ‪#‎waqthumarahai‬

नैनों में तो नीर है
दबी-दबी सी भाषा है
कपोलों पर हैं आँसू सूखे
और चेहरे पे हताशा है ।

कपडों को समेटे हुए
वो सुकची रुआँसा है
बुदबुदाती हम हीं क्यों
क्या सिर्फ इसलिए हमें तराशा है।

पेट में तो भूख है उसके
पर गला बिलकुल भरा सा है
क्योंकि वो निर्भया बचती बचाती
भागी अब तक बेतहाशा है।

क्या सहनशक्ति हीं उसकी
उसके गले का फांसा है
और करे क्या वो जब
समाज हीं एक तमाशा है।

शायद आज किसी तरह निकल जाये
मंजर जो डरा सा है
येहि सोचती दामिनी बिलकुल
कल हमारा नया सा है।

तोड़ देंगे सब ज़ंजीरों को
मजबूती उसकी जरा सा है
जाग उठें हैं हम अब
और मन में भी एक आशा है।

कल की सुबह है आज पहली
मंजर बिलकुल बदला सा है
जहाँ तक नज़र गयी वहां तक देखा
वक़्त आज नया सा है ।

हम सेना में, और एवरेस्ट पर भी हम अब
जरुरत पर अब जहाज भी उड़ाते हैं
डॉक्टर, इंजीनियर,रिपोर्टर भी हम अब
हम तो अब अन्तरिक्ष में भी जाते है।

कन्धों से कंधे मिलेकर चल रहे हम
प्रशासन भी चलाते हैं
और भारत की संसद से
अब कानून भी बनाते है।

भीड़ में अब हम भी
डरते नहीं डराते हैं
जरूरत गर पर जाये तो
भीड़ भी बनाते है।

वक़्त हमारा आ चूका है
बदली अब परिभाषा है
मंजिले अब है करीब
ये वक़्त सचमुच नया सा है।

By | 2016-12-11T07:20:44+00:00 July 28th, 2015|Uncategorized|0 Comments

Leave A Comment